मनी लॉन्ड्रिंग केस में सुप्रीम कोर्ट की ED को फटकार:क्या हम इतने कठोर हो सकते हैं कि आरोपी को मामले से जुड़े दस्तावेज न दिखाएं

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (4 अगस्त) को मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले की जस्टिस अभय एस ओका, जस्टिस ए अमानुल्लाह और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने सुनवाई की। ED की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू कोर्ट में मौजूद रहे। फिलहाल बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। बेंच ने ED से पूछा- एजेंसी आरोपी को जांच के दौरान जब्त किए दस्तावेजों नहीं दे रही है। क्या ऐसा होना आरोपी के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है। ऐसे बहुत ही गंभीर मामले हैं, जिनमें जमानत दी जाती है, लेकिन आजकल मजिस्ट्रेट के केसों में लोगों को जमानत नहीं मिल रही। दरअसल, साल 2022 का सरला गुप्ता बनाम ED इस सवाल से संबंधित है कि क्या जांच एजेंसी आरोपी को उन महत्वपूर्ण दस्तावेजों से वंचित कर सकती है, जिन पर वह प्री-ट्रायल फेज में PMLA मामले में भरोसा कर रही है। कोर्ट रूम ASG राजू और जजों के सवाल-जवाब जस्टिस अमानुल्लाह: क्या आरोपी को केवल तकनीकी आधार पर दस्तावेज देने से मना किया जा सकता है। सब कुछ पारदर्शी (ट्रांसपेरेंट) क्यों नहीं हो सकता? ASG: अगर आरोपी को पता है कि दस्तावेज हैं तो वह पूछ सकता है। अगर उसे नहीं पता है और उसे सिर्फ अनुमान है तो वह इस पर जांच की मांग नहीं कर सकता। बेंच: क्या यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं करेगा, जो जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। जस्टिस ओका: PMLA मामले में आप हजारों दस्तावेज प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन आप उनमें से केवल 50 पर भरोसा करते हैं। आरोपी को हर दस्तावेज याद नहीं हो सकता। फिर वह पूछ सकता है कि मेरे घर से जो भी दस्तावेज बरामद हुए हैं, वो दिए जाएं। ASG: आरोपी के पास दस्तावेजों की एक लिस्ट है और जब तक यह जरूरी न हो तब तक वह उन्हें नहीं मांग सकता। बेंच: मान लीजिए कि आरोपी हजारों पेजों के दस्तावेजों के लिए आवेदन करता है। यह मिनटों का मामला है, क्योंकि आज के समय में इन्हें आसानी से स्कैन किया जा सकता है। जस्टिस ओका: समय बदल रहा है। हम और दूसरी तरफ के वकील दोनों का उद्देश्य न्याय करना है। क्या हम इतने कठोर हो जाएंगे कि एक व्यक्ति जो केस का सामना कर रहा है, लेकिन हम जाकर कहते हैं कि दस्तावेज सुरक्षित हैं? क्या यह न्याय होगा? ऐसे बहुत ही गंभीर मामले हैं जिनमें जमानत दी जाती है, लेकिन आजकल मजिस्ट्रेट के मामलों में लोगों को जमानत नहीं मिल रही है। समय बदल रहा है। क्या हम इस पीठ के रूप में इतने कठोर हो सकते हैं? यदि कोई आरोपी जमानत या मामले को खारिज करने के लिए दस्तावेजों पर निर्भर करता है तो उसे दस्तावेज मांगने का अधिकार है। सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू: आरोपी को ऐसा कोई अधिकार नहीं है, वो अदालत से इस पर गौर करने का अनुरोध कर सकता है। मान लीजिए कि ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है और यह स्पष्ट रूप से कन्विक्शन का मामला है। और आरोपी केवल मुकदमे में देरी करना चाहता है, तो यह अधिकार नहीं हो सकता। 28 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- बेल नियम है और जेल एक अपवाद सुप्रीम कोर्ट ने 28 अगस्त को अवैध खनन मामले में हेमंत सोरेन के करीबी प्रेम प्रकाश को बेल दी थी। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत दर्ज केस में जांच एजेंसी को निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा था किसी व्यक्ति की आजादी मूल सिद्धांत है। हमने सिसोदिया केस में भी कहा था कि बेल नियम है और जेल एक अपवाद। PMLA के सेक्शन 45 में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपी के बेल की 2 शर्तें दी गई है। पहला, जब ऐसा लग रहा हो कि आरोपी ने कोई अपराध नहीं किया है। दूसरा, जमानत पर आरोपी कोई अपराध नहीं करेगा। लेकिन ये दोनों चीजें आजादी के मूल सिद्धांत को नहीं रोक सकतीं। कोर्ट ने कहा था कि इस केस में ऐसा लगता है कि आरोपी प्रेम प्रकाश को बेल मिलने के बाद भी केस पर असर नहीं पड़ेगा। इसलिए हम प्रेम प्रकाश को बेल दे रहे हैं। बेंच ने कहा- यह देखकर दुख हो रहा है, प्रॉसिक्यूशन को निष्पक्ष रहना चाहिए। जो व्यक्ति खुद को दोषी बताता है उसे गवाह बना दिया जाता है। पूरी खबर पढ़ें... 9 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने मनीष सिसोदिया को जमानत दी थी दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया 9 अगस्त को 17 महीने बाद तिहाड़ जेल से बाहर आए थे। सुप्रीम कोर्ट ने दोपहर में​​​ उन्हें दिल्ली शराब नीति घोटाले से जुड़े CBI और ED के केस में जमानत दी थी। कोर्ट ने कहा कि केस में अब तक 400 से ज्यादा गवाह और हजारों दस्तावेज पेश किए जा चुके हैं। आने वाले दिनों में केस खत्म होने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है। ऐसे में सिसोदिया को हिरासत में रखना उनके स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा। पूरी खबर पढ़ें...

मनी लॉन्ड्रिंग केस में सुप्रीम कोर्ट की ED को फटकार:क्या हम इतने कठोर हो सकते हैं कि आरोपी को मामले से जुड़े दस्तावेज न दिखाएं
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (4 अगस्त) को मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले की जस्टिस अभय एस ओका, जस्टिस ए अमानुल्लाह और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने सुनवाई की। ED की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू कोर्ट में मौजूद रहे। फिलहाल बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। बेंच ने ED से पूछा- एजेंसी आरोपी को जांच के दौरान जब्त किए दस्तावेजों नहीं दे रही है। क्या ऐसा होना आरोपी के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है। ऐसे बहुत ही गंभीर मामले हैं, जिनमें जमानत दी जाती है, लेकिन आजकल मजिस्ट्रेट के केसों में लोगों को जमानत नहीं मिल रही। दरअसल, साल 2022 का सरला गुप्ता बनाम ED इस सवाल से संबंधित है कि क्या जांच एजेंसी आरोपी को उन महत्वपूर्ण दस्तावेजों से वंचित कर सकती है, जिन पर वह प्री-ट्रायल फेज में PMLA मामले में भरोसा कर रही है। कोर्ट रूम ASG राजू और जजों के सवाल-जवाब जस्टिस अमानुल्लाह: क्या आरोपी को केवल तकनीकी आधार पर दस्तावेज देने से मना किया जा सकता है। सब कुछ पारदर्शी (ट्रांसपेरेंट) क्यों नहीं हो सकता? ASG: अगर आरोपी को पता है कि दस्तावेज हैं तो वह पूछ सकता है। अगर उसे नहीं पता है और उसे सिर्फ अनुमान है तो वह इस पर जांच की मांग नहीं कर सकता। बेंच: क्या यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं करेगा, जो जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है। जस्टिस ओका: PMLA मामले में आप हजारों दस्तावेज प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन आप उनमें से केवल 50 पर भरोसा करते हैं। आरोपी को हर दस्तावेज याद नहीं हो सकता। फिर वह पूछ सकता है कि मेरे घर से जो भी दस्तावेज बरामद हुए हैं, वो दिए जाएं। ASG: आरोपी के पास दस्तावेजों की एक लिस्ट है और जब तक यह जरूरी न हो तब तक वह उन्हें नहीं मांग सकता। बेंच: मान लीजिए कि आरोपी हजारों पेजों के दस्तावेजों के लिए आवेदन करता है। यह मिनटों का मामला है, क्योंकि आज के समय में इन्हें आसानी से स्कैन किया जा सकता है। जस्टिस ओका: समय बदल रहा है। हम और दूसरी तरफ के वकील दोनों का उद्देश्य न्याय करना है। क्या हम इतने कठोर हो जाएंगे कि एक व्यक्ति जो केस का सामना कर रहा है, लेकिन हम जाकर कहते हैं कि दस्तावेज सुरक्षित हैं? क्या यह न्याय होगा? ऐसे बहुत ही गंभीर मामले हैं जिनमें जमानत दी जाती है, लेकिन आजकल मजिस्ट्रेट के मामलों में लोगों को जमानत नहीं मिल रही है। समय बदल रहा है। क्या हम इस पीठ के रूप में इतने कठोर हो सकते हैं? यदि कोई आरोपी जमानत या मामले को खारिज करने के लिए दस्तावेजों पर निर्भर करता है तो उसे दस्तावेज मांगने का अधिकार है। सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू: आरोपी को ऐसा कोई अधिकार नहीं है, वो अदालत से इस पर गौर करने का अनुरोध कर सकता है। मान लीजिए कि ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है और यह स्पष्ट रूप से कन्विक्शन का मामला है। और आरोपी केवल मुकदमे में देरी करना चाहता है, तो यह अधिकार नहीं हो सकता। 28 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था- बेल नियम है और जेल एक अपवाद सुप्रीम कोर्ट ने 28 अगस्त को अवैध खनन मामले में हेमंत सोरेन के करीबी प्रेम प्रकाश को बेल दी थी। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत दर्ज केस में जांच एजेंसी को निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा था किसी व्यक्ति की आजादी मूल सिद्धांत है। हमने सिसोदिया केस में भी कहा था कि बेल नियम है और जेल एक अपवाद। PMLA के सेक्शन 45 में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपी के बेल की 2 शर्तें दी गई है। पहला, जब ऐसा लग रहा हो कि आरोपी ने कोई अपराध नहीं किया है। दूसरा, जमानत पर आरोपी कोई अपराध नहीं करेगा। लेकिन ये दोनों चीजें आजादी के मूल सिद्धांत को नहीं रोक सकतीं। कोर्ट ने कहा था कि इस केस में ऐसा लगता है कि आरोपी प्रेम प्रकाश को बेल मिलने के बाद भी केस पर असर नहीं पड़ेगा। इसलिए हम प्रेम प्रकाश को बेल दे रहे हैं। बेंच ने कहा- यह देखकर दुख हो रहा है, प्रॉसिक्यूशन को निष्पक्ष रहना चाहिए। जो व्यक्ति खुद को दोषी बताता है उसे गवाह बना दिया जाता है। पूरी खबर पढ़ें... 9 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने मनीष सिसोदिया को जमानत दी थी दिल्ली के पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया 9 अगस्त को 17 महीने बाद तिहाड़ जेल से बाहर आए थे। सुप्रीम कोर्ट ने दोपहर में​​​ उन्हें दिल्ली शराब नीति घोटाले से जुड़े CBI और ED के केस में जमानत दी थी। कोर्ट ने कहा कि केस में अब तक 400 से ज्यादा गवाह और हजारों दस्तावेज पेश किए जा चुके हैं। आने वाले दिनों में केस खत्म होने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है। ऐसे में सिसोदिया को हिरासत में रखना उनके स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा। पूरी खबर पढ़ें...